गोपेश्वर। चण्डी प्रसाद भट्ट पर्यावरण एवं विकास केंद्र की ओर से मण्डल चिपको आंदोलन की 54वीं वर्षगांठ के अवसर पर राजकीय इंटर कॉलेज वैरागना में एक विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में छात्र-छात्राओं को चिपको आंदोलन के इतिहास और इसके महत्व के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई।
गोष्ठी को संबोधित करते हुए केंद्र के प्रबंध न्यासी ओमप्रकाश भट्ट ने बताया कि 24 अप्रैल 1973 को मण्डल घाटी से विश्व प्रसिद्ध चिपको आंदोलन की शुरुआत हुई थी। उस समय सरकार द्वारा मण्डल क्षेत्र के जंगलों को इलाहाबाद (अब प्रयागराज) की एक निजी कंपनी को सौंपे जाने के खिलाफ स्थानीय लोगों ने जोरदार विरोध किया था। उन्होंने बताया कि दशोली ग्राम स्वराज्य मंडल के नेतृत्व में ग्रामीणों ने जन-जागरूकता अभियान चलाकर जंगलों को बचाने का संकल्प लिया।

उन्होंने कहा कि 24 अप्रैल 1973 को गोंडी (मण्डल) में आयोजित सभा में “वन जागे, वनवासी जागे” के नारे के साथ लोगों ने पेड़ों की कटाई के खिलाफ ऐतिहासिक प्रतिरोध किया, जिसके चलते कंपनी के मजदूरों को बिना पेड़ काटे वापस लौटना पड़ा।
इस अवसर पर विद्यालय के प्रभारी प्रधानाचार्य रविंद्र फर्सवाण ने कहा कि पहले जहां जंगलों को कुल्हाड़ी से बचाने की चुनौती थी, वहीं आज उन्हें आग से बचाना बड़ी जिम्मेदारी बन गई है। उन्होंने सभी से मिलकर जंगलों की सुरक्षा के लिए आगे आने का आह्वान किया।

कार्यक्रम में मनोज तिवाड़ी, मंगला कोठियाल और विनय सेमवाल सहित कई वक्ताओं ने चिपको आंदोलन की प्रासंगिकता पर अपने विचार रखे। इस दौरान बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं, शिक्षक और समाजसेवी मौजूद रहे।
