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एलिवेटेड रोड परियोजना को लेकर प्रभावित लोगों ने किया प्रदर्शन, डीएम को सौंपा ज्ञापन

देहरादून। एलिवेटेड रोड परियोजना में भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास को लेकर प्रभावित परिवारों का विरोध तेज हो गया है। बस्ती बचाओ आंदोलन के बैनर तले बड़ी संख्या में प्रभावित लोगों ने जिलाधिकारी कार्यालय पर प्रदर्शन किया और भूमि अधिग्रहण अधिनियम 2013 के तहत सभी प्रभावितों को मुआवजा व पुनर्वास का लाभ दिए जाने की मांग की। प्रदर्शनकारियों ने अपर तहसीलदार प्रदीप नेगी के माध्यम से जिलाधिकारी को ज्ञापन सौंपकर प्रशासनिक हस्तक्षेप की मांग की।

प्रदर्शनकारियों ने लोक निर्माण विभाग द्वारा कागजात जमा कराने की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए इसे तत्काल रोकने की मांग की। उनका कहना है कि जब तक सभी प्रभावितों की सही पहचान और सर्वे पूरा नहीं हो जाता, तब तक किसी भी तरह की आगे की कार्रवाई अनुचित है।

मुआवजे को लेकर बयान से भड़का आक्रोश
ज्ञापन में एलिवेटेड रोड परियोजना के अध्यक्ष एवं उपजिलाधिकारी सदर के उस बयान पर कड़ा विरोध जताया गया है, जिसमें कहा गया था कि परियोजना से प्रभावित 2883 परिवारों में से केवल 373 को ही मुआवजा और पुनर्वास मिलेगा, जबकि शेष 2507 परिवारों को सरकारी भूमि पर कब्जेदार माना जा रहा है। इस बयान के बाद प्रभावित परिवारों में भारी आक्रोश देखने को मिल रहा है।

जनसुनवाई में भी जताया गया था विरोध
बस्ती बचाओ आंदोलन का कहना है कि एलिवेटेड रोड परियोजना जनस्वीकृत योजना नहीं है। जनसुनवाई के दौरान भारी दबाव के बावजूद अधिकांश प्रभावितों ने लिखित रूप से परियोजना का विरोध दर्ज कराया था। पर्यावरण विशेषज्ञों द्वारा परियोजना को पर्यावरण के लिए नुकसानदेह बताए जाने और लगातार आंदोलनों के बावजूद इसे लागू किया जाना दुर्भाग्यपूर्ण है।

नदियों को अतिक्रमण मुक्त करने पर उठे सवाल
प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि एक ओर सरकार हाईकोर्ट और एनजीटी में बिंदाल-रिस्पना नदियों को अतिक्रमण मुक्त करने का शपथपत्र दे रही है, वहीं दूसरी ओर एलिवेटेड रोड के नाम पर बिना स्पष्ट पुनर्वास नीति के बड़े पैमाने पर विस्थापन की तैयारी की जा रही है। उनका कहना है कि नदियों के किनारे प्रभावशाली लोगों के कब्जों को अतिक्रमण नहीं माना जा रहा।

हाईकोर्ट में मामला विचाराधीन
ज्ञापन में यह भी उल्लेख किया गया कि एलिवेटेड रोड परियोजना को लेकर उत्तराखंड हाईकोर्ट में जनहित याचिका लंबित है, जिस पर शीघ्र सुनवाई होनी है। आंदोलनकारियों ने प्रशासन से आग्रह किया कि न्यायालय के निर्णय से पहले कोई भी अंतिम कदम न उठाया जाए।

भूमि अधिग्रहण अधिनियम 2013 का हवाला
प्रदर्शनकारियों ने भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापना अधिनियम 2013 का हवाला देते हुए कहा कि इसका उद्देश्य केवल मुआवजा देना नहीं, बल्कि प्रभावित परिवारों के जीवन स्तर की रक्षा और पुनर्वास सुनिश्चित करना है। उन्होंने सामाजिक प्रभाव आकलन, उचित मुआवजा, वैकल्पिक आवास, रोजगार सहायता और विस्थापन भत्ते जैसी सुविधाएं सभी प्रभावितों को देने की मांग की।

मुख्य मांगें
आंदोलनकारियों का कहना है कि प्रभावित परिवार वर्ष 2010 से पहले और कई तो पिछले 20 से 50 वर्षों से बिंदाल-रिस्पना क्षेत्र में निवास कर रहे हैं, जिनमें अधिकांश घोषित मलिन बस्तियों में रहते हैं। ऐसे सभी परिवार भूमि अधिग्रहण अधिनियम 2013 के अंतर्गत लाभ के अधिकारी हैं। इसके साथ ही सर्वे से वंचित परिवारों को सूची में शामिल करने और कागजात सत्यापन की प्रक्रिया के लिए पर्याप्त समय देने की मांग की गई।

ज्ञापन सौंपने वालों में आंदोलन के संयोजक अनंत आकाश, भगवंत पयाल, विप्लव अनंत, अभिषेक भंडारी, सोनू कुमार, अकरम, अफ्सा खान, सुशीला, आकिल, जुनेथ और फिरोज सहित अन्य लोग शामिल रहे।