अनन्त आकाश
दिल्ली का जंतर-मंतर भारतीय लोकतंत्र का वह प्रतीकात्मक स्थल है जहाँ दशकों से आम नागरिक, किसान, मजदूर और छात्र अपनी बात कहने आते रहे हैं। लेकिन 2026 की शरद ऋतु में यह स्थान उस संघर्ष का केंद्र बन गया जिसने सत्ता, पुलिस और संविधान के बीच के तनाव को बेपर्दा कर दिया। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और एसआईआर (SIR) प्रक्रिया को रोकने की मांग को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP), वामपंथी दलों, सीपीएम, एसएफआई और डीवाईएफआई, आईसा तथा सामाजिक संगठनों के नेतृत्व में जो आंदोलन खड़ा हुआ, उसके सामने सत्ता तंत्र ने जो रुख अपनाया, वह लोकतांत्रिक मूल्यों के लिऐ एक परीक्षा है।
संघर्ष की पृष्ठभूमि: -सवालों का संवैधानिक आधार
इस आंदोलन की जड़ें मतदाता सूची से 13 करोड़ नाम हटाए जाने के फैसले में हैं। सरकार के केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले ने इसका बचाव करते हुए कहा कि यह कार्रवाई पारदर्शी तरीके से की गई और विपक्ष चाहे कितना भी प्रदर्शन करे, ज्ञानेश कुमार इस्तीफा नहीं देंगे। लेकिन विपक्ष ने कहा है कि “इतने बड़े विवाद और देशव्यापी विरोध के बाद उन्हें इस महत्वपूर्ण संवैधानिक पद पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं है”तथा एकतरफा फैसले लेने का आरोप लगाते हुए इस्तीफे की मांग की थी।विपक्ष ने कहा उनकी लड़ाई “चुनाव आयोग और ज्ञानेश कुमार के खिलाफ थी, लेकिन मोदी-शाह ने इसे खुद के खिलाफ लड़ाई बना लिया”।
हिंदुत्ववादी संगठनों की आक्रामकता और पुलिस की मिलीभगत
आंदोलन के सामने सबसे पहला मोर्चा हिंदू रक्षा दल (HRD) का था। संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष पिंकी चौधरी ने सोशल मीडिया पर वीडियो जारी करके खुलेआम धमकी दी कि उनके कार्यकर्ता लाठी-डंडे लेकर जंतर-मंतरपरिवार पहुँचेंगे और “सनातन विरोधी लोगों को कड़ा सबक सिखाएँगे”। वीडियो में उनके समर्थकों के हाथों में लाठियाँ साफ़ दिखाई दे रही थीं।
10 व 11 अक्टूबर को यह धमकी हकीकत में बदली। HRD ने प्रदर्शनकारियों पर हमले का वीडियो सोशल मीडिया पर साझा किया, जिसमें लोगों को पीटा जा रहा था। पिंकी चौधरी ने इस वीडियो के साथ लिखा—”यह मेरे कार्यकर्ता हैं… जितने भी कॉकरोच मिले उनका दिमाग ठीक करने की ताकत हिंदू रक्षा दल में है और वह करता रहेगा निरंतर।” यह एक दुर्लभ मामला था जब किसी संगठन ने सार्वजनिक रूप से हिंसा की जिम्मेदारी ली और उसका प्रचार किया।
बजरंग दल और RSS की भूमिका अपेक्षाकृत अधिक जटिल रही। जहाँ बजरंग दल ने आधिकारिक तौर पर जंतर-मंतर पर कार्यक्रम से इनकार किया, वहीं बजरंग दल के सदस्य मोनू मानेसर ने अलग से प्रदर्शनकारियों को धमकाया। RSS और बजरंग दल के बड़े पैमाने पर पहुँचने की अफवाहों को बाद में फर्जी बताया गया, लेकिन HRD के कार्यकर्ताओं ने जंतर-मंतर जाने की कोशिश की, जिन्हें गाजियाबाद पुलिस ने यूपी गेट पर रोक दिया और पिंकी चौधरी को नजरबंद कर दिया। इस पूरे घटनाक्रम में यह सवाल उठता है कि जब HRD के कार्यकर्ता खुलेआम हथियार लेकर हिंसा की धमकी दे रहे थे, तब प्रशासन की भूमिका क्या थी?
सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप और दिल्ली पुलिस की अवहेलना
दिल्ली पुलिस ने आंदोलन को कुचलने के लिए जो तैयारी की, वह भारतीय लोकतंत्र में दुर्लभ है। जंतर-मंतर के सभी रास्तों पर बैरिकेडिंग की गई, मेट्रो स्टेशन बंद कर दिए गए, इंटरनेट सेवाएँ ठप कर दी गईं, और मध्य दिल्ली में धारा 163 लागू कर दी गई। 30,000 से अधिक पुलिसकर्मी तैनात किए गए, और पुलिस का दावा था 7,000 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया गया, जबकि यह संख्या कई गुना अधिक थी!
सुप्रीम कोर्ट ने रविवार को एक विशेष सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की बेंच के माध्यम से सख्त निर्देश दिए। कोर्ट ने कहा कि “शांतिपूर्ण तरीके से इकट्ठा होने वाले लोगों को अवैध रूप से हिरासत में न लिया जाए” , मेट्रो और रेल सेवाएँ सामान्य रूप से चलाई जाएँ, बैरिकेडिंग हटाई जाए, और इंटरनेट बंद न किया जाए। कोर्ट ने जंतर-मंतर पर बैरिकेडिंग और मेट्रो स्टेशनों को बंद करने को “गैर-जरूरी” करार दिया।
लेकिन सवाल यह है कि क्या दिल्ली पुलिस ने इन आदेशों का पालन किया? CJP ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के उल्लंघन की अवमानना याचिका दायर की। CJP की प्रेस कॉन्फ्रेंस में आरोप लगाया गया कि पुलिस ने “बिना लिखित आधार बताए हिरासत में लिया, कानूनी सलाहकार से मिलने नहीं दिया, बिना जब्ती मेमो के फोन जब्त कर लिए और प्रदर्शनकारियों के साथ शारीरिक हमला व धमकी दी”। पिछले 72 घंटों को “आपातकाल जैसी स्थिति” बताया गया। यह स्थिति संविधान के अनुच्छेद 19(1)(b) और 21 के तहत मिले मौलिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है इस वार्ता में एस एफ आई की राष्ट्रीय संयुक्त सचिव व जेएनयू छात्र संघ की पूर्व अध्यक्ष आईशी घोष शामिल थी जिन्होंने मोदी, अमित शाह की दिल्ली पुलिस व उनके गुण्डों द्वारा किस तरह आन्दोलनकारियों व पत्रकारों व आमजन पर किये जा रहे हमलों का चिठ्ठा खोलकर रख दिया
मोदी-शाह की चुप्पी: एक राजनीतिक संकेत
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की इस पूरे घटनाक्रम पर चुप्पी अत्यंत अर्थपूर्ण है। जब दिल्ली पुलिस सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवहेलना कर रही थी, जब HRD के कार्यकर्ता खुलेआम लाठियों से लैस होकर हिंसा की जिम्मेदारी ले रहे थे, तब देश के सर्वोच्च राजनीतिक नेतृत्व का मौन एक स्पष्ट संदेश देता है। CJP ने कहा कि यह लड़ाई मोदी-शाह ने खुद पर ले ली है। अरविंद केजरीवाल ने कहा कि “ज्ञानेश कुमार के साथ मोदी जी का भी इस्तीफा न दिला दे”। कौल सिंह ठाकुर ने आरोप लगाया कि “नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने देश में अघोषित आपातकाल लगा दिया है”।
भाजपा का विरोधाभासी रुख और संदीप पात्रा का बयान
भाजपा ने आंदोलन को “फ्लॉप शो” और “भीड़तंत्र” करार दिया। संदीप पात्रा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि “जंतर-मंतर पर जो हो रहा है, वो भारत की कहानी नहीं है… आज अराजक तत्वों का फेल कार्यक्रम ध्वस्त हो चुका है”। भाजपा के यूपी अध्यक्ष पंकज चौधरी ने इसे “लोकतंत्र के लिए चुनौती” बताया। लेकिन यह वही भाजपा है जिसके सहयोगी संगठन HRD के कार्यकर्ता लाठियों के साथ हिंसा कर रहे थे। पात्रा का यह बयान कि “देश सुशासन के साथ आगे बढ़ रहा है”, उस समय खोखला लगता है जब सुप्रीम कोर्ट को यह कहना पड़े कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को हिरासत में न लिया जाए।
वामपंथी दलों का संघर्ष और नेताओं की गिरफ्तारी
सीपीएम के नेतृत्व में SFI और DYFI ने आंदोलन को संगठित रूप दिया। पुलिस ने सीपीएम कार्यालय से जंतर-मंतर तक मार्च कर रहे हजारों कार्यकर्ताओं पर अमानुषिक लाठीचार्ज किया। SFI के राष्ट्रीय अध्यक्ष आदर्श एम. साजी और महासचिव आयशी घोष समेत सैकड़ों कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया गया। पिनराई विजयन, एम.ए. बेबी, वृंदा करात और माणिक सरकार जैसे वरिष्ठ नेताओं को भी नहीं बख्शा गया।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद, हिरासत में लिए गए सांसद ए.ए. रहीम और अन्य कार्यकर्ताओं ने भूख हड़ताल शुरू कर दी। वामपंथी दलों ने स्पष्ट किया कि “जंतर मंतर 2.0” खत्म नहीं हुआ है।
लोकतंत्र की परीक्षा
जंतर-मंतर का यह आंदोलन केवल एक प्रदर्शन नहीं था—यह भारतीय लोकतंत्र की उस बुनियादी परीक्षा का प्रतीक है जिसमें यह तय होता है कि संवैधानिक संस्थाएँ स्वायत्त रहेंगी या सत्ता के इशारे पर चलेंगी। हिंदू रक्षा दल जैसे संगठनों का खुला हिंसक रुख, दिल्ली पुलिस का सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवहेलना, मोदी-शाह की चुप्पी, और भाजपा का “फ्लॉप शो” वाला बयान—ये सब एक ही दिशा में इशारा करते हैं: सत्ता के सामने संविधान और कानून की प्रासंगिकता कम होती जा रही है।
ज्ञानेश कुमार का पद पर बने रहना, जबकि देशव्यापी विरोध और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बाद भी कोई जवाबदेही तय नहीं हो रही, यह दर्शाता है कि चुनावी संस्थाओं की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठ चुके हैं। वामपंथी दलों और छात्र संगठनों का संघर्ष इस लड़ाई का अहम हिस्सा है, लेकिन यह लड़ाई केवल एक दल या एक विचारधारा की नहीं है—यह उस संवैधानिक लोकतंत्र की लड़ाई है जिसमें नागरिक को अपनी बात कहने का अधिकार है, चाहे वह सत्ता को कितना भी अप्रिय लगे।
जब तक दिल्ली पुलिस सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का पालन नहीं करती, जब तक हिंसा करने वाले संगठनों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होती, और जब तक सत्ता की चुप्पी नहीं टूटती—तब तक जंतर-मंतर केवल एक प्रदर्शन स्थल नहीं, बल्कि लोकतंत्र के उस चौराहे का प्रतीक बना रहेगा जहाँ से गुजरने वाले हर राहगीर से यह पूछा जाता है: तुम किस तरफ हो?


