अनन्त आकाश
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की तैयारियां तेज हो चुकी हैं। चुनाव आयोग के संकेतों के मुताबिक, राज्य में फरवरी-मार्च 2027 में मतदान हो सकता है। लेकिन चुनावी मौसम शुरू होते ही राज्य की राजनीति का रुख वही पुराना हो गया है—गरीब जनता को साड़ी, कंबल और राशन किट बांटकर वोट का जुगाड़, और सांप्रदायिक मुद्दों को हवा देकर ध्रुवीकरण करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी जा रही है।
जनता की असली समस्याएं—टूटी सड़कें, बदहाल सफाई व्यवस्था, सरकारी अस्पतालों में इलाज की तड़प, झुग्गी-झोपड़ी वासियों के पास मालिकाना हक का अभाव, महंगाई, बेरोजगारी, कानून-व्यवस्था, महिला हिंसा, निजीकरण और स्मार्ट मीटर से आमजन के साथ हो रही लूटखसौट—इन सबसे मुख्यधारा के दलों का कोई सीधा वास्ता नहीं दिखता। बल्कि असली मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए दोनों दल एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं।
भाजपा और कांग्रेस: दिखावे का चुनावी गणित
भाजपा अपने “डबल इंजन” और डीबीटी नेटवर्क के सहारे मैदान में है। पार्टी के पास 7.5 लाख से अधिक लाभार्थियों का नेटवर्क है, लेकिन आलोचकों का कहना है कि हाईवे और शहरी विकास के नारों के बीच गरीब बस्तियों की आवाज दब गई है। दूसरी तरफ, इन गरीबों को दोनों दल अपने वोट बैंक के लिए उपयोग कर रहे हैं। बस्तियों के मालिकाना हक तथा वहाँ नागरिक सुविधाओं का सवाल ठंडे बस्ते में है—यह केवल चुनावी मुद्दा बनकर रह गया। कांग्रेस और भाजपा शासन ने इस संदर्भ में कुछ नहीं किया, बल्कि एलिवेटेड रोड जैसी भीमकाय सड़क परियोजना लाकर हजारों परिवारों का विस्थापन वर्तमान धामी सरकार कर रही है।
सांप्रदायिक हिंसा: ध्रुवीकरण का नया हथियार?
2026 में देहरादून समेत उत्तराखंड के कई हिस्सों में सांप्रदायिक तनाव की घटनाएं सामने आईं। जून 2026 में देहरादून के बैरागीवाला गांव में सिंचाई के पानी को लेकर हुए विवाद ने सांप्रदायिक हिंसा का रूप ले लिया। इस घटना में एक व्यक्ति की हत्या हो गई, और इसके बाद भीड़ ने आरोपियों के घरों में आग लगा दी, पथराव किया। प्रशासन ने इलाके में इंटरनेट बंद कर दिया और भारी पुलिस बल तैनात किया गया। जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने आरोप लगाया कि बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने मुस्लिम निवासियों के घरों, दुकानों और मस्जिदों को निशाना बनाया, जिससे कई परिवार पलायन को मजबूर हुए।
इसी तरह, जून 2026 में कर्णप्रयाग में पार्किंग विवाद को लेकर निहंग सिख तीर्थयात्रियों और स्थानीय लोगों के बीच झड़प हुई, जिसमें पांच लोग घायल हो गए। राज्य सरकार ने इसे सांप्रदायिक रंग देने से इनकार किया, लेकिन सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होने के बाद पंजाब और अन्य राज्यों में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए।
जुलाई 2026 में टिहरी जिले के कैंथौली गांव में सत्संग की आड़ में धर्मांतरण का मामला सामने आया। ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि बाहरी लोग अनुसूचित जाति के ग्रामीणों को प्रलोभन देकर धर्म परिवर्तन के लिए प्रेरित कर रहे थे। प्रशासन ने जांच शुरू की, लेकिन वीडियो में सीधे धर्मांतरण की पुष्टि नहीं हुई। राजधानी देहरादून में आए दिन सांप्रदायिक घटना होना आम बात है।
इन घटनाओं के बाद यह सवाल उठता है—क्या सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति जनता की असली समस्याओं को दबाने का हथियार बन रही है?
CPI(M) और जनसंगठनों का रुख: जनता के हर सवाल का व्यापक उत्तर
भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) ने देहरादून में जनता की असली समस्याओं को सीधे उठाया है। पार्टी के साथ सीटू (CITU), एसएफआई (SFI), महिला समिति, किसान सभा, एआईएलयू (AIYLU) और पीपुल्स साइंस मूवमेंट जैसे जनसंगठन भी मजदूरों, किसानों, युवाओं, महिलाओं और आम नागरिकों की समस्याओं को लेकर सड़क से संसद तक संघर्ष कर रहे हैं। पार्टी ने उत्तराखंड के हर ज्वलंत मुद्दे को व्यापकता से उठाया है—चाहे वह आंदोलनकारियों का चिन्हीकरण हो, भूमाफियाओं के खिलाफ मोर्चा हो, या सांप्रदायिक तत्वों के विरुद्ध सतत संघर्ष।
जल ,बिधुत व अन्य समस्याओं पर: कई क्षेत्रों में पेयजल, बिधुत आपूर्ति ठप रही। CPI(M) के सचिव अनंत आकाश ने सीधे प्रशासन से समाधान की मांग की।स्मार्ट मीटर के कारण आमजन पर आर्थिक भार के खिलाफ पार्टी सतत संघर्ष कर रही है!
आवास अधिकार: पार्टी ने “बस्ती के पट्टों” की मांग को मुख्य एजेंडा बनाया है। एलिवेटेड रोड परियोजना का विरोध करते हुए पार्टी का कहना है कि इससे विस्थापन और स्थानीय रोजगार का नुकसान हो रहा है।पार्टी ने मध्यवर्गीय परिवारों, आवासहीन गरीब परिवारों को सस्ते दरों पर मकान के लिये निरन्तर संघर्ष कर रही है!
उत्तराखंड आंदोलनकारियों का चिन्हीकरण: पार्टी ने उत्तराखंड आंदोलन से जुड़े लोगों के “चिन्हीकरण” (Profiling) का मुद्दा जोरदार ढंग से उठाया है। पार्टी का कहना है कि राज्य में आंदोलनकारियों, किसानों, मजदूरों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को लगातार निशाना बनाया जा रहा है। झूठे मुकदमे दर्ज किए जा रहे हैं और उन्हें “राजद्रोही” साबित करने की कोशिश की जा रही है। CPI(M) इसके खिलाफ लगातार जन-संघर्ष कर रही है।
भूमाफियाओं के खिलाफ मोर्चा: पार्टी ने भूमाफियाओं द्वारा सरकारी भूमि, वन भूमि, और कृषि भूमि पर अवैध कब्जे का मुद्दा उठाया है। पार्टी का कहना है कि भूमाफियाओं को संरक्षण देने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए और आम जनता को उनकी जमीन का मालिकाना हक मिलना चाहिए।
सांप्रदायिक तत्वों के खिलाफ सतत संघर्ष: CPI(M) ने साफ किया है कि सांप्रदायिक ताकतें जनता को बांटकर अपनी राजनीति चमकाने का काम कर रही हैं। पार्टी ने बैरागीवाला, कर्णप्रयाग, कैंथौली जैसी घटनाओं की निष्पक्ष जांच की मांग की है और सांप्रदायिक हिंसा में शामिल तत्वों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग उठाई है।
मजदूरों का संघर्ष (सीटू): सीटू लगातार स्कीम वर्कर,अनियमित मजदूरों, ठेका श्रमिकों, सफाई कर्मियों और कारखाना श्रमिकों के हक में आंदोलन कर रहा है। न्यूनतम मजदूरी, पीएफ, ईएसआई और सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग उठाई जा रही है।
युवाओं का सवाल (एसएफआई): एसएफआई बेरोजगारी, पेपर लीक, शिक्षा के व्यापारीकरण और सरकारी नौकरियों में कमी के खिलाफ छात्रों को एकजुट कर रहा है। देहरादून के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में यह मुद्दा गर्म है।
महिलाओं की आवाज (महिला समिति): महिला समिति महिला हिंसा, घरेलू शोषण, कार्यस्थल पर उत्पीड़न, महंगाई और सामाजिक सुरक्षा के मुद्दे उठा रही है। सरकारी अस्पतालों में महिलाओं के इलाज की बदहाली पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं।अंकिता हत्याकांड में लिप्त वीआईपी की गिरफ्तारी के लिए संघर्ष जारी है!
किसानों का संघर्ष (किसान सभा): किसान सभा मुआवजा, फसल क्षति, जंगली जानवरों से नुकसान, बीज-खाद की कीमतों और कृषि भूमि अधिग्रहण के खिलाफ आवाज उठा रही है।
आम जनता को सुलभ व सस्ता न्याय (एआईएलयू): एआईएलयू का प्रमुख सवाल यही है कि आम आदमी को सुलभ एवं सस्ता न्याय कैसे मिले। पार्टी का कहना है कि आज अदालतों में मुकदमों की लंबी अवधि, महंगी वकालत, और जटिल प्रक्रियाओं के कारण गरीब आदमी न्याय से वंचित रह जाता है। एआईएलयू लोक अदालतों, निःशुल्क कानूनी सहायता, और जल्दी न्याय की व्यवस्था की मांग उठा रहा है। साथ ही, झूठे मुकदमों में फंसाए गए मासूम लोगों की रिहाई और उन्हें न्याय दिलाना इसका मुख्य एजेंडा है।
विज्ञान आंदोलन (पीपुल्स साइंस मूवमेंट): यह संगठन अंधविश्वास, फर्जी इलाज, धर्मांतरण के नाम पर शोषण और सांप्रदायिक नफरत के खिलाफ वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सामाजिक सद्भाव की बात करता है। यह जनता को बांटने वाली राजनीति के खिलाफ विकल्प प्रस्तुत करता है।
जनता का सवाल: साड़ी, सांप्रदायिकता या समाधान?
देहरादून की गरीब बस्तियों में रहने वाले लोगों का कहना है—”हमें साड़ी और कंबल नहीं चाहिए, हमें पक्का मकान, पानी, सफाई, अस्पताल और रोजगार चाहिए।” महंगाई और बेरोजगारी से जूझ रहे युवाओं का सवाल है—”क्या चुनावी मौसम में हमारी समस्याएं सिर्फ वोट बैंक बनकर रह जाती हैं?” और आम आदमी का सवाल है—”हमें सुलभ और सस्ता न्याय कब मिलेगा?”
अन्त में देहरादून और उत्तराखंड में CPI(M) और उसके जनसंगठनों की राजनीति “साड़ी बांटकर वोट का जुगाड़” के बजाय जन-आधारभूत समस्याओं पर सीधे संघर्ष पर आधारित है। जहां भाजपा और कांग्रेस सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और मुफ्तखोरी की राजनीति में उलझे हैं, वहीं CPI(M), सीटू, एसएफआई, महिला समिति, किसान सभा, एआईएलयू और पीपुल्स साइंस मूवमेंट का एजेंडा—पानी, पट्टा, विस्थापन, रोजगार, महंगाई, महिला सुरक्षा, सुलभ न्याय, आंदोलनकारियों का चिन्हीकरण, भूमाफियाओं और सांप्रदायिक तत्वों के खिलाफ सतत संघर्ष—उन मुद्दों को केंद्र में लाता है जिन्हें मुख्यधारा के दल हवा में उड़ा देते हैं।
सवाल यही है—क्या देहरादून की जनता इस बार दिखावे और ध्रुवीकरण के बजाय समाधान को चुनेगी?
