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उत्तराखण्ड के शहीदों के सपने और संघर्ष की नई पुकार:— अनन्त आकाश

उत्तराखण्ड के शहीदों के सपने और संघर्ष की नई पुकार:— अनन्त आकाश

2 अक्टूबर 2026। आज राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयन्ती पर पूरा देश उन्हें नमन कर रहा है। लेकिन उत्तराखण्ड की धरती आज भी उस काले दिवस को याद कर रही है, जब 2 अक्टूबर 1994 को मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहे पर दिल्ली जा रहे निहत्थे राज्य आन्दोलनकारियों पर पुलिस ने अंधाधुंध गोलीबारी की थी। उस दिन 6 से 7 आन्दोलनकारी शहीद हुए थे और महिलाओं के साथ बदसलूकी की गई थी। 32 साल बाद भी उस भयावह रात का मंजर उत्तराखण्ड की जनता की आँखों में तैरता है।
मैं उस दिन अपनी एसएफआई टीम के साथ घटनास्थल पर मौजूद था। हमने कई आन्दोलनकारियों को गोलीबारी से बचाया और घायलों को अस्पताल पहुंचाया। उस भयावह दौर में सीपीएम के वरिष्ठ नेता कामरेड सुरेंद्र सिंह सजवाण की भूमिका अत्यंत सराहनीय रही। उन्होंने न केवल आन्दोलनकारियों को संगठित किया, बल्कि पुलिस के अत्याचारों के खिलाफ खुलकर आवाज उठाई और पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए लगातार संघर्ष किया। उनके नेतृत्व में सीपीएम ने उस कठिन समय में आन्दोलनकारियों की ढाल बनकर काम किया।

अगले दिन, 3 अक्टूबर 1994 को जोगीवाला में सीपीएम नेता कामरेड ओम प्रकाश चौधरी के पुत्र राजेश वालिया को भी पुलिस गोली का शिकार होना पड़ा। दून अस्पताल में उन्हें मृत घोषित किया गया। उसके बाद देहरादून में कर्फ्यू लगा दिया गया था। हम लोग घण्टाघर स्थित पार्टी कार्यालय में 5 दिन रुके और मानवाधिकार आयोग से सम्पर्क साधते रहे, जहाँ उस समय सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रंगनाथ मिश्रा अध्यक्ष थे।

उत्तराखण्ड की जनता का संघर्ष व बलिदान का परिणाम यह हुआ कि 9 नवम्बर 2000 को उत्तरांचल नाम से अलग राज्य का गठन हुआ। लेकिन यहीं से शहीदों के सपनों को धोखा मिलना शुरू हो गया। सरकारों ने जन आकांक्षाओं को दरकिनार कर दिया। 26 साल बाद भी गैरसैंण को स्थायी राजधानी घोषित नहीं किया गया। 4 मार्च 2020 को तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने इसे केवल ‘ग्रीष्मकालीन राजधानी’ घोषित किया, जो शहीदों के सपनों का मजाक है।

स्थायी राजधानी गैरसैंण समिति के तत्वाधान में 15 अगस्त 2025 से देहरादून से गैरसैंण तक पदयात्रा शुरू की गई। समिति का कहना है कि राज्य गठन के वर्षों बाद भी स्थायी राजधानी का सवाल लंबित रहना उत्तराखंड की जनता के साथ न्याय नहीं है। 12 साल का सफर, 10 विधानसभा सत्र और बेजोड़ इंफ्रास्ट्रक्चर के बावजूद जनता आज भी मायूस है। गैरसैंण उत्तराखंड आंदोलन का प्रतीक है, जो पर्वतीय क्षेत्रों में सत्ता केंद्रित करने की आकांक्षा को दर्शाता है।

राज्य के गठन के 26 साल बाद भी हजारों ऐसे आन्दोलनकारी हैं जिन्होंने राज्य आंदोलन में सक्रिय भागीदारी की, जेल गए, लाठी-गोली खाई, लेकिन आज तक उन्हें आन्दोलनकारी के रूप में मान्यता नहीं मिली। सरकारी चिन्हीकरण की प्रक्रिया में हजारों वास्तविक आन्दोलनकारी पीछे छूट गए। जो चिन्हित हो भी गए, उन्हें मिलने वाली सुविधाएं और सम्मान भी अपर्याप्त है। यह उन शहीदों और आन्दोलनकारियों के बलिदान का अपमान है जिनके कारण आज उत्तराखंड राज्य अस्तित्व में है। सीपीएम लगातार मांग करती रही है कि सभी वास्तविक आन्दोलनकारियों का पुनः सत्यापन हो और छूटे हुए आन्दोलनकारियों को समुचित सम्मान और सुविधाएं मिलें।

आज उत्तराखंड में गरीब बस्तियों के लोग, फुटपाथ पर जीवन बिताने वाले, कामगार महिलाएं, छोटे किसान और असंगठित मजदूर सबसे ज्यादा पीड़ित हैं। महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है। राशन, दवा, शिक्षा और बिजली के दाम आसमान छू रहे हैं। बेरोजगारी की भयावह समस्या ने युवाओं का भविष्य अंधकारमय कर दिया है। शिक्षा और स्वास्थ्य व्यापार बन गया है।निजी स्कूल और अस्पताल आम आदमी की पहुंच से बाहर हैं। पहाड़ों से पलायन रुकने का नाम नहीं ले रहा। औद्योगिक क्षेत्रों और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों का शोषण चरम पर है। पूंजीवादी व्यवस्था ने मानवीय संवेदनाओं को खत्म कर दिया है—मुनाफे के लिए कुछ भी करना अब आम बात हो गई है। सरकारी खजाने से अनाप-शनाप खर्चे हो रहे हैं, जबकि आम जनता बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रही है। सीपीएम इन तमाम मुद्दों को लेकर निरंतर संघर्षरत है और शोषित वर्ग की आवाज बनकर खड़ी है।

प्रदेश में कानून व्यवस्था ध्वस्त हो चुकी है। माफियाओं और अवैध कारोबारियों का साम्राज्य स्थापित हो गया है। बदमाशों से ज्यादा लोग पुलिस से डरने लगे हैं। महिलाओं के खिलाफ अपराधों में उत्तराखंड पर्वतीय राज्यों में शीर्ष पर है। साम्प्रदायिक तत्व आपसी घृणा फैलाकर हिन्दू-मुस्लिम एकता को तोड़ने और जनता का ध्यान मुख्य मुद्दों से भटकाने का काम कर रहे हैं। हरिद्वार धर्म संसद, उत्तरकाशी पुरोला विवाद, हल्द्वानी बनभूलपुरा हिंसा और देहरादून बैरागीवाला उपद्रव जैसे मामले इस बात के साक्षी हैं। विकास के नाम पर जंगलों की कटाई की जा रही है। राज्य गठन 2000 से अब तक 46,203 हेक्टेयर वन भूमि डायवर्ट की जा चुकी है। भ्रष्टाचार ने सरकारी तंत्र को जकड़ लिया ।आपदा मुआवजे से लेकर विकलांगता प्रमाणपत्र तक के लिए रिश्वत मांगी जा रही है।

अंकिता हत्याकांड: रोजगार की तलाश में गई बेटी की दरिंदगी
सितंबर 2022 में ऋषिकेश के वनतारा रिसॉर्ट में 19 वर्षीय अंकिता भंडारी की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। वह रिसेप्शनिस्ट के तौर पर काम करती थी। रिसॉर्ट मालिक और उसके साथियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई, लेकिन 2025-26 में वायरल ऑडियो और वीडियो के बाद मामले में कथित ‘वीआईपी’ की भूमिका सामने आई और सीबीआई ने 9 जनवरी 2026 को अज्ञात वीआईपी के खिलाफ मामला दर्ज किया। अंकिता का मुद्दा भी रोजगार से जुड़ा था। अगर कोरोना काल में उसके पिता का रोजगार न छिनता, तो शायद अंकिता को इतनी कम उम्र में रोजगार के लिए न भटकना पड़ता और न ही उसे दरिंदगी का शिकार होना पड़ता।
आज समय की मांग है कि उत्तराखण्ड की जनता सरकार की जनविरोधी नीतियों और माफियाराज के खिलाफ एकजुट होकर खड़ी हो। जब तक आम जनता, मजदूर, किसान, युवा, महिलाएं और बुद्धिजीवी एक मंच पर नहीं आएंगे, तब तक इस भ्रष्ट और जनविरोधी व्यवस्था को हिलाया नहीं जा सकता। भूमाफियाओं, नशा माफियाओं, भ्रष्ट अफसरों और उनके राजनीतिक संरक्षकों के खिलाफ सड़क से संसद तक संघर्ष तेज करना होगा। साथ ही, साम्प्रदायिक एवं विभाजनकारी तत्वों के खिलाफ संघर्ष तेज करना होगा। उत्तराखण्ड की पहाड़ी संस्कृति और सामाजिक सौहार्द हमारी सबसे बड़ी ताकत है, इसे किसी भी कीमत पर कमजोर नहीं होने देना है।
अंकिता को तो वापस नहीं लाया जा सकता, न उसके परिजनों के दुख को कम किया जा सकेगा। लेकिन अंकिता की शहादत हमारे लिए एक सबक है। राजेश वालिया, रविंद्र रावत, सतिंदर चौहान, गिरिश भद्री, राजेश लखेरा, सूर्य प्रकाश थपलियाल, अशोक केशव और राजेश नेगी आदि शहीदों के सपनों को साकार करने के लिए हमें संघर्ष तेज करना होगा।

यह संघर्ष किसी व्यक्ति, पार्टी या संगठन का नहीं, बल्कि उत्तराखण्ड की समूची जनता का है। सीपीएम इस संघर्ष में हर मोर्चे पर आम जनता के साथ खड़ी रहेगी और कंधे से कंधा मिलाकर लड़ेगी। हमें विश्वास है कि जनता की एकजुट शक्ति के आगे कोई भी सत्ता टिक नहीं सकती। गैरसैंण स्थायी राजधानी बनेगी, चिन्हीकरण से छूटे आन्दोलनकारियों को न्याय मिलेगा, पहाड़ से पलायन रुकेगा, नशे का कारोबार खत्म होगा, भूमाफियाओं और भ्रष्ट अफसरों पर लगाम लगेगी, साम्प्रदायिक ताकतों को करारा जवाब मिलेगा और उत्तराखण्ड एक बार फिर शहीदों के सपनों का राज्य बनेगा।
आइए, इस 2 अक्टूबर को हम सब एकजुट होकर संकल्प लें कि शहीदों के बलिदान को व्यर्थ नहीं जाने देंगे। संघर्ष जारी रहेगा, जीत हमारी होगी। यही हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और उत्तराखण्ड आंदोलन के अमर शहीदों के प्रति सही मायनों में श्रद्धांजलि होगी।
इंकलाब जिंदाबाद!
शहीदों की शहादत अमर रहे!
उत्तराखण्ड की जनता एकजुट हो!
(लेखक सीपीएम से जुड़े हैं तथा एस एफ आई उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष रहे)