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एलिबेटेड रोड़ निरस्त करने की मांग को लेकर जिलाधिकारी कार्यालय पर प्रदर्शन, मुख्यमंत्री व मुख्यसचिव को ज्ञापन

देहरादून। बस्ती बचाओ आन्दोलन के वैनर के तले आज बड़ी संख्या में प्रभावितों ने जिलाधिकारी कार्यालय पर प्रदर्शन किया तथा बरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी को ज्ञापन सौंपा ज्ञापन में जनविरोधी ,पर्यावरण एलिबेटेड रोड परियोजना निरस्त करने की मांग की गई ।

इस अवसर पर बस्ती बचाओ आन्दोलन संयोजक अनन्त आकाश ,नुरैशा अंसारी ,विप्लव अनन्त प्रभात डण्डरियाल,काशीराम नौटियाल ,शबनम,बिरवति ,शहजादि,धनसिंह पंवार,रामललखन ,सुशििला,सुमित्रा रावत ,अशोक यादव ,निसार अहमद ,आकिल ,बबिता थापा, विमला बस्नेत, शैलेन्द्र भट्ट,अमरीश, उषा देवी, रवि प्रताप ,शीतल, गोलू ,पूजा देवी, रिसिका,कनिस्का ,,सजल, वंशकुमार,प्रज्जवल दीक्षित, रणजीत ,राजकुमार ,रामलखन ,दिप्पू गहलोत, सुभम , सुन्दर लाल,आदित्य ,सुरेशकुमार राजेश शर्मा, महेश पूर्वे ,नूतन ,रिश्भ, सूरजकुमार‌,अभिषेक वर्मा ,खुशबु, किरन सुनिता, आंचल ,पारस ,रामकुमार ,आंचल ,राजेश‌ अमन ,काब्या,आदित्य,सन्त बहादुर शंकर रौतेला, सन्त बहादुर थापा, ओमप्रकाश आदि बड़ी संख्या में प्रभावित शामिल थे ।

अनन्त आकाश

संयोजक बस्ती बचाओ आन्दोलन
ज्ञापन सलग्न है
(1)मुख्य सचिव महोदय,
सचिवालय,
उत्तराखण्ड सरकार, देहरादून।
(2) जिलाधिकारी महोदय
देहरादून

विषय: रिस्पना-बिंदाल एलिवेटेड रोड परियोजना से विस्थापित होने वाले परिवारों के पुनर्वास, पर्यावरण संरक्षण एवं जनहित से जुड़े गंभीर मुद्दों पर तत्काल ध्यान आकर्षित करने हेतु ज्ञापन।
महोदय,

इस प्रदर्शन के माध्यम से उत्तराखंड सरकार का ध्यान देहरादून में प्रस्तावित रिस्पना-बिंदाल एलिवेटेड रोड परियोजना (लगभग 6200 करोड़ रुपये) से उत्पन्न गंभीर जनहित, पर्यावरणीय, और कानूनी विसंगतियों की ओर दिलाना चाहते हैँ। यह पत्र उन हजारों प्रभावित परिवारों की पीड़ा और आक्रोश की आवाज़ है, जो फरवरी 2025 से लगातार अपनी बात सरकार तक पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन उनकी उपेक्षा की जा रही है।

1. भूमि अधिग्रहण एवं पुनर्वास का दोहरा मापदण्ड
यह परियोजना देहरादून की सबसे बड़ी सामाजिक और कानूनी विडम्बनाओं को उजागर करती है। सरकार द्वारा 372 रजिस्ट्रीधारियों को भूमि आधिपत्य अधिकारी द्वारा नोटिस जारी किए जाने की बात है, जबकि लगभग 2500-2600 से अधिक प्रभावित परिवार, जो दशकों से इन्हीं नदियों के किनारे ग्राम समाज, नगर निगम अथवा सरकारी भूमि पर बसे हैं, अब तक अधिसूचना के दायरे में भी नहीं हैं ।
विडंबना यह है कि ये परिवार न केवल इस शहर की रीढ़ हैं, बल्कि वर्षों से सरकार को बिजली, पानी, कर (टैक्स) देते आ रहे हैं और सरकारी योजनाओं का लाभ उठा रहे हैं। ऐसे में, जब इनके अस्तित्व पर ही बात आती है, तो सरकार इनके प्रति पूरी तरह मौन क्यों है?

भूमि अधिग्रहण कानून 2013 क्या कहता है? यह कानून (RFCTLARR Act, 2013) न केवल मुआवज़ा बल्कि प्रभावितों के पुनर्वास की भी वैधानिक गारंटी देता है। यह कानून इस बात पर बल देता है कि परियोजना से प्रभावित प्रत्येक व्यक्ति (चाहे उसके पास रजिस्ट्री हो या न हो) को सामाजिक सुरक्षा, आजीविका का अवसर और पुनर्वास का अधिकार है। सरकार सिर्फ रजिस्ट्रीधारियों को नोटिस जारी कर और हज़ारों बाशिंदों को अदृश्य मानकर इस कानून की भावना को नजरअंदाज कर रही है।

2. जनसुनवाई की अनदेखी और जन-विरोधी बजट
प्रभावितों की भारी संख्या ने सार्वजनिक सुनवाई (जनसुनवाई) में इस एलिवेटेड रोड के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया है । इसके बावजूद सरकार इस परियोजना पर बजट खर्च करने को प्रतिबद्ध है। यह स्पष्ट जन-आकांक्षाओं का अपमान है।
पर्यावरण विरोधी: इस परियोजना के लिए 1500 से अधिक पेड़ों के कटने की आशंका है, जो पहले से ही पर्यावरणविदों और सिटिजन्स फॉर ग्रीन दून जैसे संगठनों के निशाने पर है। पीडब्ल्यूडी द्वारा 17 पेड़ों का आंकड़ा जनता को गुमराह करना है, क्योंकि भूमि अधिग्रहण पूरा होने पर यह संख्या कई गुना बढ़ जाएगी ।

· नदियों का कत्ल: रिस्पना और बिंदाल नदियाँ, जिनके जीर्णोद्धार के लिए सरकार हाईकोर्ट और एनजीटी में हलफनामा दे रही है, उन्हीं के तल में कंक्रीट के खंभे गाड़ना और उनका सीमेंटीकरण करना नदियों की जैविक क्षमता (ग्राउंड वाटर रिचार्ज) को स्थायी रूप से नष्ट करने के समान है । सरकार का एक हाथ से नदी बचाने और दूसरे हाथ से उसे नष्ट करने का यह दोहरा चरित्र बेहद चिंताजनक है।

3. बदहाल सड़कें बनाम महंगी परियोजना
6200 करोड़ रुपये की इस महंगी परियोजना के बजाय, बहुत कम धनराशि से देहरादून की मौजूदा बदहाल सड़कों को सुधारा जा सकता है और सार्वजनिक परिवहन (बसों आदि) को सुदृढ़ किया जा सकता है, बिना किसी को बेघर किए । सरकार को यह बताना होगा कि क्यों वह सस्ते और अधिक प्रभावी विकल्पों को नज़रअंदाज कर एक महंगे, विस्थापनकारी विकल्प पर जोर दे रही है।

4. मसूरी का सवाल: क्षमता से अधिक भार
यह परियोजना केवल देहरादून तक सीमित नहीं है। इसके जरिए भारी यातायात को मसूरी की तरफ धकेलने की योजना है। मैक्स अस्पताल के बाद का मार्ग पहाड़ी है और भारी यातायात के लिए बिल्कुल उपयुक्त नहीं है। मसूरी की वहन क्षमता (carrying capacity) सीमित है। यदि हज़ारों अतिरिक्त वाहन वहां पहुंचेंगे, तो यह न केवल मसूरी को तबाह करेगा, बल्कि पर्यावरण और यातायात के लिए भी एक दुःस्वप्न साबित होगा ।

5. मुख्य प्रश्न: आख़िर किसके लिए है यह परियोजना?
उपरोक्त सभी तथ्यों से यही प्रश्न उठता है कि जब आमजन, पर्यावरणविद्, वास्तुविद् और हज़ारों प्रभावित परिवार इस परियोजना के खिलाफ हैं, तो सरकार किन कारणों से इसे आगे बढ़ा रही है? । यह परियोजना आखिर किन चुनिंदा लोगों को फायदा पहुंचाने के लिए है? क्या यह किसी बिल्डर लॉबी या भ्रष्टाचार का खेल तो नहीं?जैसे देहरादून स्मार्ट सिटी परियोजना में हुआ है । नागरिक समाज के सुझावों की लगातार अनदेखी से यही आशंका प्रबल होती है।
मांगें:

हम, बस्ती बचाओ आंदोलन की ओर से, आपसे निम्नलिखित मांगें करते हैं:

1. रिस्पना-बिन्दाल एलिवेटेड रोड परियोजना को तत्काल प्रभाव से रद्द किया जाए।
2. सभी प्रभावित परिवारों (चाहे रजिस्ट्रीधारी हों या न हों) की व्यापक सूची तैयार की जाए और उन्हें भूमि अधिग्रहण कानून 2013 के तहत उचित पुनर्वास एवं मुआवजा दिया जाए। पुनर्वास योजना बनाते समय प्रभावितों से संवाद किया जाए।
3. पेड़ों के कटान और नदियों के अतिक्रमण को तुरन्त रोका जाए।केवल गरीबों पर कार्यवाही करने कै बजाय बडै़ कब्जाधारियों पर कार्यवाही हो एनजीटी के आदेशों की अनुपालना सुनिश्चित की जाए।
4. परियोजना पर खर्च होने वाले 6200 करोड़ रुपये को शहर के बुनियादी ढांचे (सार्वजनिक परिवहन, मौजूदा सड़कों के सुधार, जल निकासी) और रिस्पना-बिंदाल नदियों के वास्तविक जीर्णोद्धार में लगाया जाए।
फरवरी 2025 से भेजे जा रहे हमारे पत्रों और प्रभावितों की आपत्तियों को लगातार नज़रअन्दाज किया जा रहा है। यह पत्र उन लाखों लोगों की अंतिम औपचारिक अपील है। यदि इस ओर ध्यान नहीं दिया गया, तो हमें आंदोलन के और तीव्र रूप धारण करने के लिए बाध्य होना पड़ेगा।
हम आशा करते हैं कि एक संवेदनशील प्रशासनिक अधिकारी होने के नाते आप इस मामले में हस्तक्षेप करेंगे और देहरादून की जनता तथा उसकी नदियों को विनाश से बचाएंगे।